तुम चाहती हो तुमको भूलूं
मैं भूलूंगा
मेरा गीत मुझे लौटा दो
मैं जी लूँगा।
गाया था जो संग तुम्हारे
मधुर क्षणों मे,भंवरों के संग
गीत मुझे लौटा दो
मैं जी लूँगा
तुम चाहती हो तुमको भूलूं
मैं भूलूंगा
मेरा गीत मुझे लौटा दो
मैं जी लूँगा।
चंदा की वह मधुर चाँदनी
छत पर जा जब बातें की थी
चाँदनी मुझको लौटा दो
मैं जी लूँगा
तुम चाहती हो तुमको भूलूं
मैं भूलूंगा
मेरा गीत मुझे लौटा दो
मैं जी लूँगा।
अमुवा की वह छावं घनी
पवन संग झुला झूले थे
मुझको लौटा दो
मैं जी लूंगा
तुम चाहती हो तुमको भूलूं
मैं भूलूंगा
मेरा गीत मुझे लौटा दो
मैं जी लूँगा।
तन्हाई मे तिल-तिल जीना
और मिलन की इच्छा करना
पल मुझको लौटा दो
मैं जी लूंगा
तुम चाहती हो तुमको भूलूं
मैं भूलूंगा
मेरा गीत मुझे लौटा दो
मैं जी लूँगा।
जारी है.
प्रस्तुतकर्ता a.kirtivardhan पर 9:37 AM 0 टिप्पणियाँ
मंगलवार, 23 जून 2009
रविवार, 7 जून 2009
अनुशासन
_____अनुशासन ____
माँ
नहीं पिलाती दूध
उस मासूम को
समय -बसमे
जब वह होता है
भूखा
और रोता है
दूध के लिए.
माँ
नहीं कराती उसे
स्तनपान
क्योंकि
डर है उसे
अपनी
देहयष्टि के
खराब होने का.
माँ
नहीं पिला सकती
दूध
वक़्त -बेवक्त
उस अबोध को
जो नहीं जानता
समय का महत्व
और
माँ की व्यस्तता .
हाँ
वह सीख जाता है
जन्म से ही
बोतल से दूध पीना
सिर्फ
और सिर्फ
निर्धारित समय पर.
डॉ अ किर्तिवर्धन
०९९११३२३७३२
माँ
नहीं पिलाती दूध
उस मासूम को
समय -बसमे
जब वह होता है
भूखा
और रोता है
दूध के लिए.
माँ
नहीं कराती उसे
स्तनपान
क्योंकि
डर है उसे
अपनी
देहयष्टि के
खराब होने का.
माँ
नहीं पिला सकती
दूध
वक़्त -बेवक्त
उस अबोध को
जो नहीं जानता
समय का महत्व
और
माँ की व्यस्तता .
हाँ
वह सीख जाता है
जन्म से ही
बोतल से दूध पीना
सिर्फ
और सिर्फ
निर्धारित समय पर.
डॉ अ किर्तिवर्धन
०९९११३२३७३२
शनिवार, 2 मई 2009
अगर मैं प्रधानमन्त्री......
mitron, ultateer.blogspot.com par bahut hi sunder bahash padhne ko mili.aap bhi usme hissa lekar sarthak bahash ko aage badhaayen.
dr.a.kirtivardhan
dr.a.kirtivardhan
मंगलवार, 14 अप्रैल 2009
पत्थरों मे गीत
कौन कहता है
पर्वतों मे गीत नहीं होता
कठोरता के बीच
मधुर संगीत नहीं होता?
होता है बहुत कुछ
पत्थर के दिलों मे
बस सुनाने का अपना
अंदाज नहीं होता.
देखा है रोते हुए
पत्थरों को मैंने
बहते हैं उनके अंशु
जो गिरते हैं झरने.
आहें भरा करते
पत्थर जो लुढ़कते
जब तन से उनके वृक्षों के
आँचल है सरकते.
सरकता है जब आँचल
बे पर्दगी होती
उघडा हुआ हो जिस्म
निगाहें सबकी लगी होती.
होते हैं जो इंसान
कभी वो भी बहकते
हसरत लिए दिल मे
भले चुप ही रहते.
सुनने को गीत पत्थरों का
पर्वत को काटते.
कटे हुए जिस्म पर
फिर कंकरीट लादते.
कटते हुए पर्वत भला
गीत कौन सा गायें
नंगा हुआ जिस्म उनका
गीत कैसे सुनाएँ?
देखो जरा पर्वतों पर
वृक्ष लगाकर
नंगे हुए जिस्म पर
हरी चुनरी सजाकर.
पत्थरों मे गीत
तुम्हे सुनाई पड़ेंगे
बहते हुए झरने
तब संगीत बनेंगे.
चुनरी हरी हो यदि
माता के भाल पर
खेलती हों नदियाँ
उसकी कदम ताल पर.
कंकरीट के जंगलों का
न हो वहाँ जमाव
पत्थरों मे गीत के
मधुर स्वर आयेंगे.
आओ हम सब मिलकर कम से कम एक पेड़ का रोपण अवस्य करें.
आओ हम एक प्रण करें
धरती पर वन सघन करें
वृक्ष धरा के आभूषण
दूर करें सब प्रदुषण .
और अपनी धरती,पातळ,गगन,जल,वायु एवं अग्नि की पवित्रता बनाये रखने का संकल्प लें.
डॉ.अ.किर्तिवर्धन
पर्वतों मे गीत नहीं होता
कठोरता के बीच
मधुर संगीत नहीं होता?
होता है बहुत कुछ
पत्थर के दिलों मे
बस सुनाने का अपना
अंदाज नहीं होता.
देखा है रोते हुए
पत्थरों को मैंने
बहते हैं उनके अंशु
जो गिरते हैं झरने.
आहें भरा करते
पत्थर जो लुढ़कते
जब तन से उनके वृक्षों के
आँचल है सरकते.
सरकता है जब आँचल
बे पर्दगी होती
उघडा हुआ हो जिस्म
निगाहें सबकी लगी होती.
होते हैं जो इंसान
कभी वो भी बहकते
हसरत लिए दिल मे
भले चुप ही रहते.
सुनने को गीत पत्थरों का
पर्वत को काटते.
कटे हुए जिस्म पर
फिर कंकरीट लादते.
कटते हुए पर्वत भला
गीत कौन सा गायें
नंगा हुआ जिस्म उनका
गीत कैसे सुनाएँ?
देखो जरा पर्वतों पर
वृक्ष लगाकर
नंगे हुए जिस्म पर
हरी चुनरी सजाकर.
पत्थरों मे गीत
तुम्हे सुनाई पड़ेंगे
बहते हुए झरने
तब संगीत बनेंगे.
चुनरी हरी हो यदि
माता के भाल पर
खेलती हों नदियाँ
उसकी कदम ताल पर.
कंकरीट के जंगलों का
न हो वहाँ जमाव
पत्थरों मे गीत के
मधुर स्वर आयेंगे.
आओ हम सब मिलकर कम से कम एक पेड़ का रोपण अवस्य करें.
आओ हम एक प्रण करें
धरती पर वन सघन करें
वृक्ष धरा के आभूषण
दूर करें सब प्रदुषण .
और अपनी धरती,पातळ,गगन,जल,वायु एवं अग्नि की पवित्रता बनाये रखने का संकल्प लें.
डॉ.अ.किर्तिवर्धन
धर्मनिरपेक्षता
धर्मनिरपेक्षता
-----------
धर्मनिरपेक्षता क्या है? राज नेताओं का लड़ाने का खेल,सत्ता प्राप्त करने की सीढ़ी.
वास्तव मे कोई धर्मनिरपेक्ष हो ही नहीं सकता.
मानव जन्म यदि लिया है
सबकी अपनी जाती है
हर जाती के संग जुडी
धर्म की अपनी थाती है
अपने धर्म का आदर करना
मानव की पहचान है
गैरों को भी आदर देना
धर्म का यह पैगाम है.
धर्म निरपेक्ष पशु होते हैं
नहीं उनका कोई धर्म बना
-----------
धर्मनिरपेक्षता क्या है? राज नेताओं का लड़ाने का खेल,सत्ता प्राप्त करने की सीढ़ी.
वास्तव मे कोई धर्मनिरपेक्ष हो ही नहीं सकता.
मानव जन्म यदि लिया है
सबकी अपनी जाती है
हर जाती के संग जुडी
धर्म की अपनी थाती है
अपने धर्म का आदर करना
मानव की पहचान है
गैरों को भी आदर देना
धर्म का यह पैगाम है.
धर्म निरपेक्ष पशु होते हैं
नहीं उनका कोई धर्म बना
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